tandav web series review hindi
तांडव देखने के बाद उन्हें जो समझ आया वो मैं आपके साथ शेयर करने वाली हूं। यह सीरीज खुलती है ग्रेटर नोएडा से सटे एक गांव में किसानों के प्रदर्शन से। इसमें कॉलेज के कुछ स्टूडेंट्स भी हिस्सा ले रहे हैं। यहां से दो लड़के गायब हो जाते हैं और एक को पुलिस उठा ले जाती है। शुरूआत लगती है कई पॉलिटिकल सेलेब्स बेड होते हैं मगर ये सीरीज रियालिटी शो छोड़ने की बजाय फिक्शन से ही चिपके रहना चाहती हैं। दूसरी तरफ पिछले तीन टर्म से देश के प्रधानमंत्री पद पर बैठे देवकीनंदन आम चुनावों के नतीजे का इंतजार कर रहे हैं। रुझानों के मुताबिक उनकी पार्टी ऐतिहासिक जीत करने जा रही है। उनका बेटा प्रताप उसे भी प्रधानमंत्री बनना हमारे मां बनने वाली वेब सीरीज की तमाम बातों की तरह यहां भी देवकी जी को अपने बेटे के लगते हैं। समर को ये बात बहुत खलती है। चुनावों में देवकी नंदन की पार्टी बड़ी जीत दर्ज करती है।

उसी शाम वो अपने ऑफिस में बैठ पाए जाते हैं। कट टू कॉलेज पॉलिटिक्स यानी स्टूडेंट शिवा शेखर की अगुवाई में कुछ लड़के अपनी गिरफ्तार दोस्त को छुड़ाने जाते हैं उन्हें पुलिस पीट देती है। मगर रिहाई की लड़ाई जारी रहती है। देवकी की मौत की वजह हार्टअटैक बताई जाती है। मगर मामला उलझ जाता है। पता चलता है कि उनकी मौत ज़हर दिए जाने से हुई है। कत्ल का इल्जाम घूम फिरकर मीठा पानी आ जाता है। चार बहनों की थी मगर इस मौके का फायदा उठाया देवकी की असोसिएट और उनकी पार्टी की सीनियर लीडर अनुराधा किशोर ने सियासी ट्रिक्स का इस्तेमाल कर समाज की बजाय खुद देश की गद्दी पर काबिज हो जाती है। अब उन्हें प्रधानमंत्री पद से हटाकर वापस कैसे पाता है। तांडव के पहले सीजन के दो एपिसोड की कहानी इतनी ही है।
बीच में बहुत सारे सप्लायर्स हैं जिन्हें आपको लव स्टोरी से लेकर कॉलेज पॉलिटिक्स गद्दी की लालच जाति और मसान से रिचा चड्ढा वाला सेगमेंट देखने को मिल जाता है। सवाल ये है कि तांडव कागज पर जितनी स्लीप पॉलिटिकल थ्रिलर लग रही है स्क्रीन पर वैसी ही लगती है। जवाब है तांडव में देवकी नंदन का रोल किया है तिग्मांशु धूलिया ने। इसे देखकर गैंग्स ऑफ वासेपुर वाले रामाधीर सिंह याद आ जाते हैं एक ऐसा किरदार जिसने जीवन भर के अच्छे बुरे अनुभवों को सिर्फ सोखा नहीं उससे सीखा भी तिग्मांशु जितना ही मजबूती से निभाया गया है। देवकी के बेटे सैफ अली खान ये एक पॉलिटिकल मास्टरमाइंड हैं। ऐसे रोल सैफ ओमकारा और रेस जैसी फिल्मों में कर चुके हैं। मगर काफी डरा हुआ है उसने जो किया है किसी को पता चल गया तो उसका पूरा पॉलिटिकल करियर खत्म हो जाएगा।

मगर वो अपनी गद्दी पर अपना अधिकार पाने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं। सैफ अली खान पहले भी करके दिखाया है कि वो ये सब कर सकते हैं। इसी सिरीज ने जिस ऐक्टर को वाकई परफॉर्म करने का मौका दिया है वो है सुनील ग्रोवर के तांडव में सुनील ने गुरपाल का किरदार निभाया है जो समय के लिए काम करता है वो कम शब्दों में सटीक बात करता है। के लिए गलत काम करके उस पर पर्दा डालना उसकी नौकरी है। एहसान के साथ सुनील ग्रोवर ने इस सीरियस कैरेक्टर को मजेदार बना दिया है। कुमुद मिश्रा ने देवकी नंदन के करीबी मित्र गोपाल दास का रोल किया है जो उनकी मौत के तुरंत बाद देश का नया प्रधानमंत्री बनने की कवायद शुरू कर देता है मगर मौका उसे छीन लेता है। डिम्पल कपाड़िया ने अनुराधा किशोर का रोल किया है। अनुराधा को ब्लैकमेल करके देश की प्रधानमंत्री बन जाती है और फिर बड़ी लानत मलानत के बाद उन्हें वो पद छोड़ना पड़ता है। यह एक महिला का रोल है मगर बड़ा स्वतः ही डिम्पल को आप कुछ भी करने को देंगे उसे एक रंग ले जाकर छोड़ेंगे। हां उनके पास स्क्रीन टाइम परफॉर्मेंस को बहुत कम है। मोहम्मद जीशान अयूब ने शिवा शिखा नाम के कॉलेज स्टूडेंट का रोल किया है जिसे रांझना स्टाइल में कॉलेज पॉलिटिक्स से नैशनल पॉलिटिक्स में लाने की कोशिश की जाती है।
विशाल को देखकर लगता है कि वो अपना रोल प्ले कर रही। बस इस वर्जन में कन्विक्शन ज्यादा है। शानदार एक्ट्रेस को किसी प्रोजेक्ट से जोड़कर कैसे करना है इसका ट्यूटोरियल आपको कहीं नहीं मिलेगा। इस दो और एक्ट्रेस जो इस सीरीज में चार चांद लगाते हैं वो एक्टर्स राजीव गुप्ता और मुकेश भट्ट राजीव ने इंस्पेक्टर नरेंद्र जाखड़ का रोल किया है। इन्हें हमने इससे पहले मदारी और हिंदी मीडियम जैसी फिल्मों में देखा। छटे एपिसोड में गुरपाल इंस्पेक्टर जाकिर को मिलने के लिए बुलाता है। यहां पहुंचते ही नरेन गुल पास गाड़ी के पेपर और लाइसेंस दिखाने को कहता है। इसी में राजीव का काम देखकर मजा आ जाता है। सातवें एपिसोड में गुरपाल उस अस्पताल के चपरासी छोटेलाल से मिलने जाता है जहां देवकी की मौत हुई थी। छोटेलाल का रोल किया है मुकेश भट्ट ने गुरपाल से मिलने के बाद छोटेलाल कहता है कि आपके मानने के पहले ही ले आया। हमारे साथी श्वेतांग के लिए फिल्म में इन दोनों एक्टर्स का काम करता है। वो कहते हैं कि वो जब कभी भी तांडव के बारे में सोचेंगे तो उन्हें ये सीन जरूर याद आएंगे। तांडव के साथ सबसे बड़ी दिक्कत ये है कि आपको एक से लेकर नौ एपिसोड के बीच कभी बांध नहीं पाती। ये सीरीज कभी बोरिंग नहीं होती मगर किसी तरह का थ्रिल एक्साइटमेंट महसूस करवा पाने में नाकाम रहती है। फिल्म के अधिकतर कैरेक्टर्स की बैक स्टोरी नहीं बताई जाती जो जैसा है वैसा क्यों है इन चीजों के ऊपर कोई बात नहीं होती।
एक दो कैरेक्टर्स के बारे में बिल्कुल रनिंग कमेंट्री स्टाइल में बात होती है जिसे कुछ साफ नहीं हो पाता। इसमें उनके पात्र अलग अलग भले आपको ठीक लग सकते हैं मगर वो एक साथ आकर इस सीरीज की कोई मदद नहीं कर पाते। ये बड़े प्रोडक्शन लेवल पर बनी एक छिछली पॉलिटिकल थ्रिलर है जिसे लगता है कि वो बहुत डीप तांडव देखकर लगता है कि इन नेताओं के कपड़े भी मनीष मल्होत्रा की डिजाइन करते हैं क्योंकि सब लोग जुट जाएं सीरीज़ में दिखता अच्छा नहीं लगता। एक बात ये जान लीजिए कि इस सीरीज़ में समर प्रताप सिंह के घर वाले हिस्से को सैफ के खानदानी महल पटौदी पैलेस में शूट किया गया है। सीरीज के कुछ डायलॉग्स बड़े मारक हैं। को अपनी पार्टी से चुनाव लड़ने का ऑफर देते वक्त लगेगा कि मैं इस मौके का फायदा उठा रहा हूं या मैंने तुम्हारी मदद अपने फायदे के लिए की वो सब लगने दो। ये बिल्कुल लॉजिकल और प्रैक्टिकल बात है। राइटर्स और फिल्ममेकर्स की नई पौध इसी तरह की सोच समझ अपने काम में लेकर आती है। एकमात्र डिपार्टमेंट अपने लिए कुछ अंक बटोर पाती है इसलिए इसके लिए 2004 में आई युवा के गाने को खुद एआर रहमान ने किया है।
इस गाने की सीरीज में होने या नहीं होने का कुछ खास फर्क नहीं पड़ता क्योंकि वो कोई प्रभाव नहीं छोड़ पाते। एक्टर टाइगर श्रॉफ का बैकग्राउंड स्कोर हमें उस एक्साइटमेंट को फील करने के लिए कहता है जो सीरीज में कहीं है ही नहीं। तांडव को पूरा देख चुकने के बाद ऐसा नहीं लगता कि कुछ ग्राउंड ब्रेकिंग या शानदार चीज देखने में किसी चीज पर सोचने के लिए प्रेरित करती है ना ही अपनी किसी और बात को पूरी गंभीरता के साथ रख पाती हैं। एंटरटेनमेंट कोशेंट भी कुछ खास नहीं है इसलिए इसके होने का मकसद समझ नहीं आता। अगर कुछ परफॉर्मेंस को छोड़ दें तो ऐसी कोई चीज नहीं है जिसे आप याद रख पाएं। कुलमिलाकर तांडव एक बड़े मौके को बर्बाद करती हुई सी लगती है।

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